Wednesday, March 14, 2018

स्त्री या पुरुष, कभी किसी को भूलकर भी न बताएं अपनी ये 9 बातें

 शुक्राचार्य महान ज्ञानी के साथ-साथ एक अच्छे नीतिकार भी थे। शुक्राचार्य की नीतियां आज के समय में भी प्रासंगिक हैं। शुक्रनीति में शुक्राचार्य ने 9 ऐसी बातें बताई हैं, जिन्हें हर हाल में छुपाकर रखना चाहिए। अगर आपकी ये 9 बातें किसी को पता चल जाए तो इससे आपको नुकसान हो सकता है या समाज के सामने आपकी प्रतिष्ठा का नुकसान पहुंच सकता है।
श्लोक
आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मंत्रमैथुनभेषजम्।
दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेतू।।
1. मैथुन यानि कामक्रिया
कामक्रिया पति और पत्नी के बीच की अत्यंत गुप्त बातों में से एक होती है। इस बात को जितना गुप्त रखा जाए, उतना अच्छा होता है। पति-पत्नी की निजी बातें किसी तीसरे मनुष्य को पता चलना, उसके लिए परेशानी और कई बार शर्म का भी कारण बन सकती है।
2. आयु
हमेशा से कहा जाता है कि मनुष्य को अपनी आयु हर किसी के सामने नहीं बतानी चाहिए। आयु को जितना गुप्त रखा जाए, उतना ही अच्छा माना जाता है। आपकी आयु का पता चलने पर विरोधी इसका इस्तेमाल आपके खिलाफ भी कर सकते हैं।

3. गृहच्छिद्रं यानि घर के भेद
बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो अपने घर-परिवार की सारी बातें अपने मित्र, रिश्तेदार या किसी परिचित से शेयर करते रहते हैं। ऐसे लोग बाद में पछताते हैं। इससे घर के सदस्यों में आपसी मनमुटाव और अविश्‍वास की भावना बढ़ती है। घर की बातें घर में ही रखने से जीवन सुखमय बनता है।

4. धन
पैसों से जीवन में कई सुख-सुविधाएं पाई जा सकती हैं, लेकिन कई बार यही पैसा आपके लिए परेशानी का कारण भी बन सकता है। अपके धन की जानकारी जितने कम लोगों को हो, उतना ही अच्छा माना जाता है। वरना कई लोग अपके धन के लालच में आपसे जान-पहचान बढ़ाकर बाद में आपको नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

5. औषध
औषध का अर्थ है डॉक्टर। डॉक्टर एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो आपके बारे में कई निजी बातें भी जानता है। ऐसे में आपके दुश्मन या आपसे जलने वाले चिकित्सक की मदद से आपके लिए परेशानी या समाज में शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं। इसलिए, बेहतर यही होगा कि आपके औषध या चिकित्सक की जानकारी सभी लोगों से गुप्त रखी जाए।

6. दान
दान एक ऐसा पुण्य कर्म है, जिसे गुप्त रखने पर ही उसका फल मिलता है। जो मनुष्य दूसरों की तारीफ पाने के लिए या लोगों के बीच अपनी महानता दिखाने के लिए अपने किए गए दान का दिखावा करता हैं, उसके किए गए सभी पुण्य कर्म नष्ट हो जाते है।

7. मंत्र
कई लोग भगवान की कृपा पाने के लिए रोज उनकी पूजा-पाठ करते हैं। ऐसे में आप जिन मंत्रों का जप करते हैं, ये बात किसी को भी नहीं बताना चाहिए। कहा जाता है जो मनुष्य अपनी पूजा-पाठ और मंत्र को गुप्त रखता है, उसे ही अपने पुण्य कर्मों का फल मिलता है।

8. मान
कई लोगों को अपने मान-सम्मान का दिखावा करने की आदत होती है। यह आदत किसी भी मनुष्य के लिए अच्छी नहीं होती। मान-सम्मान का दिखावा करने से लोगों की नजर में आपके प्रति नफरत का भाव आ सकता है।

9. अपमान
मनुष्य को यदि कभी अपमान का सामना करना पड़ जाए तो उसे इस बात को सभी से गुप्त ही रखना चाहिए। यह बात दूसरों को बताने से आपके लिए ही नुकसानदायक साबित हो सकती हैं। दूसरों को पता चलने पर वे भी अपना सम्मान करना छोड़ देंगे और आप हंसी का पात्र भी बन सकते हैं।

Thursday, March 8, 2018

कोई भी महिला आफत में है तो लगाए इस नंबर पर फोन, देशभर में करता है काम



महिलाओं की मदद के लिए सरकार ने नंबर जारी किए हैं। इन पर कॉल करके तुरंत मदद पाई जा सकती है। वुमंस हेल्पलाइन नंबर 1091/1090 पूरे देश के लिए है। इसके अलावा महिलाएं नेशनल कमिशन फॉर वुमन (NCW) में अपनी कोई बात रखना चाहें तो वे 0111-23219750 पर कॉल कर सकती हैं। राज्यों ने अपने स्तर पर भी हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं। जिन पर कॉल करके तुरंत मदद पाई जा सकती है।


राजधानी में इन नंबरों के जरिए महिलाओं को मिलती है मदद
दिल्ली कमिशन फॉर वुमन (DCW) से 011 23378044/ 23378317/ 23370597 पर संपर्क किया जा सकता है। पुलिस कंट्रोल रूम 100, चाइल्ड हेल्पलाइन 1098, एंटी स्टाकिंग सेल से 1096 पर कॉल कर मदद मांगी जा सकती है।
महिलाओं से कोई नहीं छीन सकता ये अधिकार
> हर महिला को कुछ Rights मिले हुए हैं। कोई भी ये अधिकार महिला से छीन नहीं सकता, जैसे वुमन अपने पार्टनर को शारीरिक संबंध बनाने के लिए मना कर सकती है। इसी तरह कोई बलात्कार की शिकार हुई किसी भी महिला को मुफ्त कानूनी मदद पाने का अधिकार होता है। ऐसे मामले में लीगल सर्विस अथॉरिटी को महिला के लिए वकील की व्यवस्था करनी होती है। वहीं, किसी मामले में यदि महिला आरोपी है तो उसकी जो भी मेडिकल जांच की जाएगी, वह किसी महिला द्वारा ही की जाना चाहिए।
> इसके अलावा पुश्तैनी संपत्ति पर भी महिला और पुरुष का बराबर का हक है। हाईकोर्ट एडवोकेट संजय मेहरा का कहना है कि ये अधिकार महिलाओं को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मिला हुआ है। वर्क प्लेस पर यदि किसी महिला का यौन उत्पीड़न होता है तो वह यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत इसके खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकती है। आज हम महिलाओं से जुड़े ऐसे 6 राइट्स बताने जा रहे हैं, जो हर व्यक्ति को मालूम होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति महिलाओं को इन अधिकारों को लेने से रोक नहीं सकता।


Saturday, December 10, 2016

विपश्यना : साधना की आवश्यकता क्यों?

विपश्यना का अर्थ है- विशेष विधि से देखना। मन को देखना, संवेदनाओं को देखना, स्फुरण को देखना, कंपन को देखना, सुख-दुःख भरी स्मृतियों को देखना। केवल देखते रहना। यह प्रक्रिया कोई आसान नहीं है। साधना कीविपश्यना (Vipassana) आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की अत्यंत पुरातन साधना-विधि है। जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देखना-समझना विपश्यना है। लगभग २५०० वर्ष पूर्व भगवान गौतम बुद्ध ने विलुप्त हुई इस पद्धति का पुन: अनुसंधान कर इसे सार्वजनीन रोग के सार्वजनीन इलाज, जीवन जीने की कला, के रूप में सर्वसुलभ बनाया।जिवन जीनेकी  कला . इस सार्वजनीन साधना-विधि का उद्देश्य विकारों का संपूर्ण निर्मूलन एवं परमविमुक्ति की अवस्था को प्राप्त करना है। इस साधना का उद्देश्य केवल शारीरिक रोगों को नहीं बल्कि मानव मात्र के सभी दुखों को दूर करना है।
विपश्यना आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की साधना है। अपने ही शरीर और चित्तधारा पर पल-पल होनेवाली परिवर्तनशील घटनाओं को तटस्थभाव से निरीक्षण करते हुए चित्तविशोधन का अभ्यास हमें सुखशांति का जीवन जीने में मदद करता है। हम अपने भीतर शांति और सामंजस्य का अनुभव कर सकते हैं।
हमारे विचार, विकार, भावनाएं, संवेदनाएं जिन वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलते हैं, वे स्पष्ट होते हैं। अपने प्रत्यक्ष अनुभव से हम जानते हैं कि कैसे विकार बनते हैं, कैसे बंधन बंधते हैं और कैसे इनसे छुटकारा पाया जा सकता है। हम सजग, सचेत, संयमित एवं शांतिपूर्ण बनते हैं।

परंपरा

भगवान बुद्ध के समय से निष्ठावान् आचार्यों की परंपरा ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस ध्यान-विधि को अपने अक्षुण्ण रूप में बनाए रखा। इस परंपरा के वर्तमान आचार्य श्री सत्य नारायण गोयन्काजी, है। वे भारतीय मूल के है लेकिन उनका जन्म म्यंमा (बर्मा) में हुआ एवं उनके जीवन के पहले पैतालिस वर्ष म्यंमा में ही बीते। वहां उन्होंने प्रख्यात आचार्य सयाजी ऊ बा खिन, जो की एक वरिष्ठ सरकारी अफसर थे, से विपश्यना सीखी। अपने आचार्य के चरणों में चौदह वर्ष विपश्यना का अभ्यास करने बाद सयाजी ऊ बा खिन ने उन्हें १९६९ में लोगों को विपश्यना सिखलाने के लिए अधिकृत किया। उसी वर्ष वे भारत आये और उन्होंने विपश्यना के प्रचार-प्रसार का कार्य शुरू किया। तब से उन्होंने विभिन्न संप्रदाय एवं विभिन्न जाती के हजारो लोगों को भारत में और भारत के बाहर पूर्वी एवं पश्र्चिमी देशों में विपश्यना का प्रशिक्षण दिया है। विपश्यना शिविरों की बढ़ती मांग को देखकर १९८२ में श्री गोयन्काजी ने सहायक आचार्य नियुक्त करना शुरू किया।

शिविर

विपश्यना दस-दिवसीय आवासी शिविरों में सिखायी जाती है। शिविरार्थियों को अनुशासन संहिता, का पालन करना होता है एवं विधि को सीख कर इतना अभ्यास करना होता है जिससे कि वे लाभान्वित हो सके।
शिविर में गंभीरता से काम करना होता है। प्रशिक्षण के तीन सोपान होते हैं। पहला सोपान—साधक पांच शील पालन करने का व्रत लेते हैं, अर्थात् जीव-हिंसा, चोरी, झूठ बोलना, अब्रह्मचर्य तथा नशे-पते के सेवन से विरत रहना। इन शीलों का पालन करने से मन इतना शांत हो जाता है कि आगे का काम करना सरल हो जाता है। अगला सोपान— नासिका से आते-जाते हुए अपने नैसर्गिक सांस पर ध्यान केंद्रित कर आनापान नाम की साधना का अभ्यास करना। चौथे दिन तक मन कुछ शांत होता है, एकाग्र होता है एवं विपश्यना के अभ्यास के लायक होता है—अपनी काया के भीतर संवेदनाओं के प्रति सजग रहना, उनके सही स्वभाव को समझना एवं उनके प्रति समता रखना। शिविरार्थी दसवे दिन मंगल-मैत्री का अभ्यास सीखते हैं एवं शिविर-काल में अर्जित पुण्य का भागीदार सभी प्राणियों को बनाया जाता है।
यह साधना मन का व्यायाम है। जैसे शारीरिक व्यायाम से शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है वैसे ही विपश्यना से मन को स्वस्थ बनाया जा सकता है।
साधना विधि का सही लाभ मिलें इसलिए आवश्यक है कि साधना का प्रसार शुद्ध रूप में हो। यह विधि व्यापारीकरण से सर्वथा दूर है एवं प्रशिक्षण देने वाले आचार्यों को इससे कोई भी आर्थिक अथवा भौतिक लाभ नहीं मिलता है। शिविरों का संचालन स्वैच्छिक दान से होता है। रहने एवं खाने का भी शुल्क किसी से नहीं लिया जाता। शिविरों का पूरा खर्च उन साधकों के दान से चलता है जो पहिले किसी शिविर से लाभान्वित होकर दान देकर बाद में आने वाले साधकों को लाभान्वित करना चाहते हैं।
निरंतर अभ्यास से ही अच्छे परिणाम आते हैं। सारी समस्याओं का समाधान दस दिन में ही हो जायेगा ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। दस दिन में साधना की रूपरेखा समझ में आती है जिससे की विपश्यना जीवन में उतारने का काम शुरू हो सके। जितना जितना अभ्यास बढ़ेगा, उतना उतना दुखों से छुटकारा मिलता चला जाएगा और उतना उतना साधक परममुक्ति के अंतिम लक्ष्य के करीब चलता जायेगा। दस दिन में ही ऐसे अच्छे परिणाम जरूर आयेंगे जिससे जीवन में प्रत्यक्ष लाभ मिलना शुरू हो जायेगा।
सभी गंभीरतापूर्वक अनुशासन का पालन करने वाले लोगों का विपश्यना शिविर में स्वागत है, जिससे कि वे स्वयं अनुभूति के आधार साधना को परख सके एवं उससे लाभान्वित हो। जो भी गंभीरता से विपश्यना को अजमायेगा वह जीवन में सुख-शांति पाने के लिए एक प्रभावशाली तकनिक प्राप्त कर लेगा।

Monday, August 8, 2016

नमस्ते का क्या अर्थ है? – What is the meaning of Namaste

नमस्ते का क्या अर्थ है?
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अधिकतर हिन्दू लोग जब किसी से मिलते हैं तो “नमस्ते ” या ” नमस्कार ” कर के एक दुसरे का अभिवादन करते हैं, अधिकतर लोगो को ये पता ही नहीं होता की वो नमस्ते क्यूँ करते हैं और इसका क्या अर्थ होता है। उन्ही लोगो के लिए ये जानकारी भरा post है ताकि जब अगली बार किसी से नमस्ते कहें तो कम से कम उन्हें उसका अर्थ अवश्य पता हो|
दोस्तों,शास्त्रों में पाँच प्रकार के अभिवादन बतलाये गए है जिन में से एक है “नमस्ते ” या “नमस्कार “
नमस्कार को कई प्रकार से देखा और समझा जा सकता है। संस्कृत में इसे विच्छेद करे तो हम पाएंगे की नमस्ते दो शब्दों से बना है – नमः + असते
नमः का मतलब होता है झुक गया और असते का मतलब सर ( अहंकार या अभिमान से भरा ), यानि मेरा अहंकार से भरा सर आपके सम्मुख झुक गया । नम: का एक और अर्थ हो सकता है जो है न + में यानी की मेरा नहीं, सब कुछ आपका।
आध्यात्म की दृष्टी से इसमें मनुष्य दुसरे मनुष्य के सामने अपने अंहकार को कम कर रहा है। नमस्ते करते समय में दोनों हाथो को जोड़ कर एक कर दिया जाता है जिसका अर्थ है की इस अभिवादन के बाद दोनों व्यक्ति के दिमाग मिल गए या एक दिशा में हो गये।
हम बड़ों के पैर क्यों छूते है ?: भारत में बड़े बुजुर्गो के पाँव छूकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। ये दरअसल बुजुर्ग, सम्मानित व्यक्ति के द्वारा किए हुए उपकार के प्रतिस्वरुप अपने समर्पण की अभिव्यक्ति होती है। अच्छे भाव से किये हुए सम्मान के बदले बड़े लोग आशीर्वाद देते है जो एक सकारात्मक ऊर्जा होती है।
आदर के निम्न प्रकार है :
प्रत्युथान : किसी के स्वागत में उठ कर खड़े होना
नमस्कार : हाथ जोड़ कर सत्कार करना
उपसंग्रहण : बड़े, बुजुर्ग, शिक्षक के पाँव छूना
साष्टांग : पाँव, घुटने, पेट, सर और हाथ के बल जमीन पर पुरे लेट कर सम्मान करना
प्रत्याभिवादन : अभिनन्दन का अभिनन्दन से जवाब देना
पर आज कल पश्चिमी संस्कृति के हावी होने के कारण हम नमस्ते ,प्रणाम अदि कहना लगभग भूलते जा रहे हैं और अब उनकी जगह “Hi ” Hello ” Good Morning ” या ” Good Night ” जैसे शब्दों ने ले लिया जिसके अर्थ और अनर्थ का पता ही नहीं चलता। अत: हमारा आपसे ये निवेदन है की अगर आपको उचित लगे तो Hi, Hello की संस्कृति छोड़ कर नमस्ते या नमस्कार वाली सनातन संस्कृति अपनाएं, जय श्रीराम जी की बोलें, आप सभी को मेरा नमस्कार।

Saturday, September 12, 2015

जानिए भारतीय दंड संहिता की धारा 420 को

भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत किसी को व्यक्ति को कपट पूर्वक या बेईमानी से उत्प्रेरित कर आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, संपत्ति या ख्याति संबंधी क्षति पहुंचाना शामिल है। यह एक दंडनीय अपराध है। इसके तहत सात साल तक के कारावास की सजा का प्रावधान है। 
Ipc 420 ki dhara kab lagti hai?

येअपराध हैं इसमें शामिल

जब कोई व्यक्ति छल करके किसी व्यक्ति को बेईमानी से उत्प्रेरित करता है जिससे वह व्यक्ति अपनी किसी संपत्ति या उसके अंश को किसी अन्य व्यक्ति को दे दें तो यह धारा-420 के अंतर्गत दंडनीय अपराध का हकदार होगा। यदि कोई व्यक्ति कागज पर किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर बना कर उसके माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति से कोई संपत्ति प्राप्त करता है तो यह भी इस धारा के तहत आएगा। इसी तरह कोई व्यक्ति एक सही दस्तावेज हासिल करता है जिसके माध्यम से कोई संपत्ति हस्तांतरित होनी है।

यदि वह व्यक्ति उस दस्तावेज को आंशिक रूप से बदल देता है कि उसे संपत्ति का अधिक भाग प्राप्त हो जाता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। इस तरह छल करके बेईमानी से संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित होने वाली हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई वस्तु प्राप्त करने या किसी अन्य व्यक्ति को प्राप्त कराने के लिए किया गया हर कार्य इसके तहत अपराध में आता है। इस धारा का बहुत व्यापक प्रभाव है। यही कारण है कि बेईमानी करने वाले हर व्यक्ति को चार सौ बीस कहा जाने लगा है।

Friday, September 11, 2015

यदि सफल होना चाहते हैं तो इन ‘सात लोगों’ को करें अपनी ज़िंदगी से तुरंत बाहर



इंसान कब इंसान का ही दुश्मन बन जाता है, पता नहीं चलता। इसलिए समझदारी इसी में है कि हम होशियारी से अपने आसपास के लोगों को चुनें। क्योंकि यह लोग ही हमें सफल बना सकते हैं लेकिन चाहे तो हमारी ज़िंदगी को असफलता की राह पर भी चला सकते हैं।

हमारे रिश्तेदार, दोस्त और अन्य जान-पहचान के लोगों में ऐसे कई लोग होते हैं जिनकी सोच का हमारे ऊपर खासा असर पड़ता है। इन्हें आप निगेटिव सोच वाले लोग कह सकते हैं, जो जब हमारे आसपास भी होते हैं तो कुछ ना कुछ गड़बड़ ज़रूर होती है।

हो सकता है कि इन बातों को पढ़ने के बाद आपके दिमाग में भी ऐसे कुछ लोगों की छवि बन गई होगी जो आपकी सोच को बुरा बनाने में कारगर साबित होते हैं। और शायद आप चाहकर भी उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर पाते, लेकिन समझदारी इसमें ही है कि आप उन्हें छोड़ दें।

क्योंकि एक सफल इंसान वही है जो छोटी सोच वाले लोगों के साथ कोई ताल्लुकात नहीं रखता। चलिए आज हम आपको ऐसी एक लिस्ट से परिचित कराते हैं जिसके अनुसार यदि इन लोगों को आपने अपने साथ रखा तो आप कभी सफल नहीं हो पाएंगे...

आपने एक कहावत तो सुनी ही होगी, ‘हवा में बातें करना’। यानी कि ठोस तथ्य की कमी होना जिसकी वजह से लोग कुछ भी बोलते चले जाते हैं चाहे उसका कोई स्पष्ट अर्थ बने या ना बने। हमारे आसपास ऐसे कई लोग होते हैं जो अपनी लाइफ की कठिनाइयां बताते हैं, कॅरियर ठीक ट्रैक पर नहीं है, घर में परेशानी है...

लेकिन समस्या किन वजहों से है ये नहीं जानते। क्योंकि उनकी सोच गहराई में छिपे तथ्यों को पकड़ सकने में नाकामयाब हो जाती है। ऐसे लोग अपनी इस निगेटिव सोच की वजह से लाइफ की परिभाषा को ही बदल कर रख देते हैं। खुद तो उन्हें कोई सुझाव दिखाई नहीं देता, बस अपनी लाइफ को कोसते रहते हैं।

इनसे तो वैसे भी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। जो लोग अपनी लाइफ को लेकर आलसी हो सकते हैं वे किसी काम के नहीं हैं। मेरी निजी सलाह है आप लोगों से कि कभी भी अपनी लाइफ में आलसी लोगों पर निर्भर ना रहें, ये खुद का समय तो बर्बाद करते ही हैं, साथ ही आपका वक्त भी खराब करने से हिचकिचाते नहीं हैं।

आलस्य से भरपूर ऐसे लोग अपनी खुद की ज़िंदगी के लिए एक अभिशाप ही बनकर आते हैं, लेकिन जब ऐसे लोग आपसे मिलते हैं तो यह आपको भी आलसी बनाने में सफल हो जाते हैं। कृपया, ऐसे लोगों से दूर ही रहें!

विद्वान महापुरुषों ने भी कहा है कि ‘एक सफल इंसान वही है जो सादगी को पसंद करता है’। दिखावा करने वाले लोग इसी चकाचौंध में रह जाते हैं और ज़िंदगी की गाड़ी काफी आगे बढ़ जाती है। लेकिन ऐसे लोग केवल अपने लिए नहीं हमारे लिए भी घातक साबित होते हैं।

इनका एक ही मकसद होता है, दूसरों का आकर्षण पाना। और इसके लिए वे हर संभव प्रयास करते हैं जो कि इनकी ओर दूसरों को आकर्षित कर सके। जब ये हमारे आसपास होते हैं तो हमारा सबसे बड़ा नुकसान करते हैं, हमारे समय का नुकसान। इसलिए इनसे दूर ही रहें!

क्या आपके फ्रेंड सर्किल में ऐसे लोग हैं जो बिना मतलब आपको फोन करके आमंत्रित करते हैं। आज यहां चलें, आज वहां चलें, कुछ ऐसा करें। लेकिन अंत में कुछ भी अच्छा ना होने की जगह पर केवल समय ही बर्बाद होता है। इससे अच्छा तो हम अपना समय किसी अच्छी जगह लगाएं।

ख्वाहिशें, सपने और कुछ कर दिखाने की चाहत ही एक इंसान को सफल बनाती है। और जिसमें यह गुण नहीं, वे सफल नहीं हो सकते। ऐसे लोग बस एक रूटीन में काम करते हैं, लेकिन ज़िंदगी को लेकर इनकी कोई दूरदर्शिता नहीं होती।

सुबह उठना, तैयार होकर खाना खाकर काम पर जाना। शाम होने तक काम खत्म करके घर वापस लौट आना और फिर खाना खाकर सो जाना। अगले दिन वही काम दोहराना, ऐसी लाइफ का क्या मतलब?

मज़ा तो तब है जब रोज़ाना कुछ नया किया जाए, कुछ एक काम ऐसा करें जो हमें हमारे सपने की ओर ले जाए। जो हमें यह दिलासा देता रहे कि सफलता बस कुछ ही कदमों की दूरी पर है। फिर ज़िंदगी ‘ज़िंदगी’ लगने लगती है जनाब!

लेकिन सच बात यह भी है कि जो लोग खुद अपने लिए सपने नहीं पालते, वे दूसरों के सपनों में भी विश्वास नहीं करते। वे आपको भी सपनों की दुनिया से बाहर आने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। इसलिए ऐसे लोगों की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर कर देना ही ठीक रहता है। 

भाग्य आपकी मुट्ठी में

मैं ने कई बार कई लोगों को अपने भाग्य को दोष देते सुना है। इससे अधिक दुःख की बात क्या होगी कि एक सेहतमंद, हट्टा-कट्ठा और बुद्धिमान नौजवान, जिसके सामने उसका संपूर्ण जीवन अवसरों से भरा पड़ा है, यह कहता मिले कि- "उसके भाग्य में ही दर-दर की ठोकरें खाना और अभाव में जीवन गुजारना लिखा है"।  मतलब उसकी नजर में परिश्रम और प्रयास करना ही व्यर्थ है! परन्तु मुझे लगता है कि ऐसे लोगों की दुर्दशा का कारण उनकी यह सोच ही है। वे तो अपने भाग्य का रोना रो कर एक ही स्थान पर बैठे रह गये और दुनिया कहां निकल गई। उनका मानना ही होता है कि हालात सदा मेरे विरूद्ध रहे, मुझे कभी अवसर ही नहीं मिला कुछ करने के लिए। भला ऐसा कभी हो सकता है कि इतने विशाल विश्व में संभावनाओं की ही कमी हो! यह सबकुछ उनके बहाने है, जो अपनी सफाई के लिए दिए जाते हैं।

अब्राहम लिंकन की जीवनी हमारे जीवन-उत्कर्ष के लिए प्रेरणास्वरूप है। अभावों में जन्में और पले अब्राहम ने बचपन में एक सपना संजोया था - अमेरीका का राष्ट्रपति बनने का। जरा सोचिए की अगर वे प्रारम्भ में आई कठिनाइयों और असफलताओं को अपना भाग्य मान लेते और आगे कभी कांग्रेस, सीनेट, और उप-राष्ट्रपति का चुनाव ही न लड़ते! तो क्या वह कभी 52 साल की आयु में अमेरीका के राष्ट्रपति बन पाते। मुझे ऐसा लगता है कि अवसर और धन हमारे पास हमेंशा न सही पर लाइफ में एक बार आना प्रकृति का नियम है। हो सकता है किशोरवस्था में न आकर युवावस्था में आये पर आएगा जरूर। अब यदि कोई हाथ में आये अवसर को पहचान न सके या उसका उपयोग करके धनी बनने को तैयार न हो तो इसका दोषी वह स्वयं है। काम जो भी किसी को मलिता है वह छोटा या बड़ा नहीं होता। आरम्भ में तो कोई भी प्रयास सौ प्रतिसत सफल नहीं होता।

हजारों लड़के-लड़कियां केवल भाग्य के ही भरोसे अवसर पाने की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं। वे यह नहीं जानते कि अपने जिस समय की प्रतीक्षा में वे जिस अमूल्य समय को खोते जा रहे हैं वह लौटकर कभी नहीं आ सकता। अपने भाग्य के भरोसे ही वह अपने जीवन को नष्ट करते जा रहे हैं। अवसर कभी घर पर दस्तक नहीं देता, उसे तो खोजना पड़ता है। वास्तव में अवसर आपके अंदर छीपा है उसे पहचानने का प्रयास करें। भाग्य आपकी मुट्ठी में है।

जिस समय नवयुवक फैराडे प्रयोगशाला में काम करता था और विज्ञान सम्बन्धित परीक्षणों को किया करता था। तब उसने अपने मन में कहा था काश! मेरे पास एक बहुत बड़ी परीक्षण प्रयोगशाला होती। फैराडे उनमें से न था वह केवल सोचता और अपने भाग्य को कोसने लगता। उसने अद्तिीय खोजें तथा परीक्षण किये और उन्नति के पथ पर इस प्रकार अग्रसर हुआ कि सर हफेडेवी चकित रह गये। एक बार प्रसिद्ध वैज्ञानिक हफेडेवी ने उसके उस्ताद से पूछा कि आपकी सबसे उत्तम वैज्ञानिक खोज क्या है?

‘माइकल फैराडे’ - यही उनका उत्तर था।

एक और भी माइकल था माइकल एंजली। उसने एक अवसर खोज लिया और संगमरमर के टुकड़ों से डेविड की आश्चर्यजनक मूर्ति का निर्माण किया। अन्य कलाकारों के द्वारा संगमरमर के टुकड़े रद्दी में फेंक दिये गये थे उन्हें ही उठा कर माइकल एक अनमोल कलाकृति की रचना करने में सफल हुआ।

बढ़िया अवसर, प्रभावशाली मित्र, बड़ी पूंजी, उंचा कुल, किसी सिफारिश इन बातों से कोई व्यक्ति महान् नहीं बनता।

बड़ा नामवर इन्सान वही बनता है जिसके अन्दर बड़ा बनने की भावना छिपी रहती है। आप जिस अच्छे अवसर की तलाश में हैं वह आपके अन्दर छिपा है। इसे न तो किस्मत का खेल कहते हैं न ही किसी की सिफारिश या सहायता।

इसे कहते हैं कर्मठता।

आज के युवक किसी कार्य को करते समय सफलता की आशा तुरन्त कर लेते हैं, किन्तु वह अपने को बदलने और सुधारने के स्थान पर किसी भी बाधा को कोसते हुए पीछे हट जाते हैं।

जब आप यह निश्चय कर लेंगे कि कठिनाइयों का मुकाबला करना है। बाधाओं से जूझना है. तब आपको सफलता पाने में अधिक विलम्ब नहीं लगेगा। बस यही तो एक सफल और भाग्यशाली व्यक्ति का रहस्य है और रूजवेल्ट ने भी कहा है कि – ‘जो व्यक्तिी कार्य करते समय भूलें करता हैं वह अच्छा नहीं करता, किन्तु जो अपने भाग्य के भरोसे बैठा रहे और यदि भाग्य में होगा तो प्राप्त होगा अथवा कहीं शुरूआत करने पर नुकसान हो जाये ऐसा सोचने वाला व्यक्ति तुच्छ ही रह जाता है। इससे अच्छा है कि आप काम में जुट जायें।‘